श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 80: अयोध्या से गङ्गा तट तक सुरम्य शिविर और कूप आदि से युक्त सुखद राजमार्ग का निर्माण  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.80.10 
बबन्धुर्बन्धनीयांश्च क्षोद्यान् संचुक्षुदुस्तथा।
बिभिदुर्भेदनीयांश्च तांस्तान् देशान् नरास्तदा॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जहाँ कहीं उन्हें पुल बनाने लायक पानी दिखाई दिया, वहाँ उन्होंने पुल बना दिए। जहाँ कहीं उन्हें पथरीली जमीन दिखाई दी, वहाँ उन्होंने उसे पीटकर नरम बना दिया और जहाँ कहीं उन्हें पानी के बहाव के लिए रास्ता बनाना आवश्यक लगा, वहाँ उन्होंने बाँध काट दिए। इस प्रकार उन्होंने विभिन्न देशों में अपनी-अपनी आवश्यकतानुसार काम किया॥10॥
 
Wherever they saw water suitable for building bridges, they built bridges. Wherever they saw rocky ground, they pounded it to make it soft and wherever they thought it necessary to make a path for the water to flow, they cut the dam. In this way, they worked in different countries according to their needs.॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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