श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 8: मन्थरा का पुनः राज्याभिषेक को कैकेयी के लिये अनिष्टकारी बताना, कुब्जा का पुनः श्रीराम राज्य को भरत के लिये भयजनक बताकर कैकेयी को भड़काना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.8.27 
ध्रुवं तु भरतं राम: प्राप्य राज्यमकण्टकम्।
देशान्तरं नाययिता लोकान्तरमथापि वा॥ २७॥
 
 
अनुवाद
'याद रखो, यदि श्री रामजी को निष्कंटक राज्य मिल जाए, तो वे भरतजी को इस देश से अवश्य निकाल देंगे, अथवा परलोक भी भेज सकते हैं॥ 27॥
 
'Remember, if Sri Rama gets an uninterrupted kingdom, he will certainly expel Bharat from this country or he can even send him to the next world.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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