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श्लोक 2.8.20  |
कैकेय्या वचनं श्रुत्वा मन्थरा भृशदु:खिता।
दीर्घमुष्णं विनि:श्वस्य कैकेयीमिदमब्रवीत्॥ २०॥ |
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| अनुवाद |
| कैकेयी की यह बात सुनकर मंथरा को बड़ा दुःख हुआ। उसने एक लंबी और गर्म साँस लेकर कैकेयी से कहा -॥20॥ |
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| Manthara felt very sad on hearing this from Kaikeyi. She took a long and hot breath and said to Kaikeyi -॥20॥ |
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