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ramayan 2.8.18: जैसे भरत मेरे लिए आदर के पात्र हैं, वैसे ही श्री राम भी, बल्कि उनसे भी अधिक आदर के पात्र हैं; क्योंकि वे कौसल्या से भी अधिक मेरी सेवा करते हैं॥ 18॥   |   ramayan सर्ग 2.8: मन्थरा का पुनः राज्याभिषेक को कैकेयी के लिये अनिष्टकारी बताना, कुब्जा का पुनः श्रीराम राज्य को भरत के लिये भयजनक बताकर कैकेयी को भड़काना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 8: मन्थरा का पुनः राज्याभिषेक को कैकेयी के लिये अनिष्टकारी बताना, कुब्जा का पुनः श्रीराम राज्य को भरत के लिये भयजनक बताकर कैकेयी को भड़काना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.8.18 
यथा वै भरतो मान्यस्तथा भूयोऽपि राघव:।
कौसल्यातोऽतिरिक्तं च मम शुश्रूषते बहु॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जैसे भरत मेरे लिए आदर के पात्र हैं, वैसे ही श्री राम भी, बल्कि उनसे भी अधिक आदर के पात्र हैं; क्योंकि वे कौसल्या से भी अधिक मेरी सेवा करते हैं॥ 18॥
 
'Just as Bharat is worthy of respect for me, so too is Sri Rama, in fact even more so than him; because he serves me more than even Kausalya.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)