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श्लोक 2.8.17  |
सा त्वमभ्युदये प्राप्ते दह्यमानेव मन्थरे।
भविष्यति च कल्याणे किमिदं परितप्यसे॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| मन्थरा! ऐसे महान् ऐश्वर्य के समय, जब भविष्य में केवल सौभाग्य ही दिखाई दे रहा है, तू इस प्रकार क्रोध से क्यों जल रही है?॥17॥ |
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| ‘Manthra! At the time of such great prosperity, when only good fortunes are visible in the future, why are you burning with rage like this?॥ 17॥ |
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