श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 78: शत्रुज का रोष, उनका कुब्जा को घसीटना और भरतजी के कहने से उसे मूर्च्छित अवस्था में छोड़ देना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.78.4 
पूर्वमेव तु विग्राह्य: समवेक्ष्य नयानयौ।
उत्पथं य: समारूढो नार्या राजा वशं गत:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
"जब राजा स्त्री के प्रभाव में आकर कुमार्ग पर चला गया था, तब न्याय-अन्याय का विचार करके उसे बहुत पहले ही कारागार में डाल देना चाहिए था।" ॥4॥
 
"When the king had gone on the wrong path under the influence of a woman, he should have been imprisoned long ago after considering the justice and injustice." ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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