श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  2.75.65 
लालप्यमानस्य विचेतनस्य
प्रणष्टबुद्धे: पतितस्य भूमौ।
मुहुर्मुहुर्नि:श्वसतश्च दीर्घं
सा तस्य शोकेन जगाम रात्रि:॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
भूमि पर पड़े हुए भरत की बुद्धि (विवेकशक्ति) नष्ट हो गई थी। वे अचेत होकर विलाप कर रहे थे और बार-बार गहरी साँसें ले रहे थे। इस प्रकार उन्होंने वह रात शोक में बिताई॥ 65॥
 
Lying on the ground, Bharata's intelligence (discretion power) was destroyed. He was unconscious and was wailing and taking deep breaths again and again. In this way he passed the night in grief.॥ 65॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चसप्ततितम: सर्ग:॥ ७५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पचहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७५॥
 
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