श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  2.75.57 
तृषार्तं सति पानीये विप्रलम्भेन योजयन्।
यत् पापं लभते तत् स्याद् यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
'जिस आर्य की आज्ञा से कोई वन में जाता है, उसे वही पाप लगता है जो उस व्यक्ति को लगता है जो प्यासे को जल उपलब्ध होने पर भी उससे वंचित रखता है।॥ 57॥
 
'The one with whose consent an Arya goes to the forest should incur the same sin as a person who deprives a thirsty person of water even when it is available.॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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