श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  2.75.55 
धर्मदारान् परित्यज्य परदारान् निषेवताम्।
त्यक्तधर्मरतिर्मूढो यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
'जिसने आर्य श्री राम को वन में भटकने दिया है, उसे अपनी मूर्ख पत्नी को त्यागकर दूसरे की पत्नी के साथ सहवास करना चाहिए और धर्म में सारी आसक्ति त्याग देनी चाहिए ॥ 55॥
 
'The one who has permitted the Arya Sri Ram to wander in the forest should abandon his foolish wife and have sexual relations with another's wife and give up all attachment to religion. ॥ 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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