श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  2.75.53 
विप्रलुप्तप्रजातस्य दुष्कृतं ब्राह्मणस्य यत्।
तदेतत् प्रतिपद्येत यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
'जिसके कहने पर मेरे बड़े भाई को वन जाना पड़ा, उसे वही पाप लगेगा जो (अन्न न देने या पत्नी से द्वेष रखने के कारण) सन्तान खो देने वाले ब्राह्मण को लगता है ॥ 53॥
 
'The one on whose advice my elder brother had to go to the forest will incur the same sins that a Brahmin who has lost his children (due to not giving food grains or having enmity towards his wife) will incur. ॥ 53॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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