श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.75.47 
सतां लोकात् सतां कीर्त्या: सज्जुष्टात् कर्मणस्तथा।
भ्रश्यतु क्षिप्रमद्यैव यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
'वह पापी, जिसकी आज्ञा से भाई श्री रामजी को वन में प्रवेश करना पड़ा, वह शीघ्र ही सत्पुरुषों के लोक से, सत्पुरुषों की कीर्ति से और सत्पुरुषों के कर्मों से च्युत हो जाए॥ 47॥
 
'May that sinner, with whose permission brother Shri Ram had to enter the forest, soon be dethroned from the world of good men, from the fame of good men and from the deeds performed by good men.॥ 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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