vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
»
सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना
»
श्लोक 4
श्लोक
2.75.4
वनवासं न जानामि रामस्याहं महात्मन:।
विवासनं च सौमित्रे: सीतायाश्च यथाभवत्॥ ४॥
अनुवाद
‘मैं तो यह भी नहीं जानता कि महात्मा श्री राम का वनवास तथा सीता और लक्ष्मण का वनगमन कब और कैसे हुआ।’॥4॥
‘I do not even know when and how the exile of Mahatma Shri Ram and the banishment of Sita and Lakshman took place.’॥ 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×