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श्लोक 2.75.4  |
वनवासं न जानामि रामस्याहं महात्मन:।
विवासनं च सौमित्रे: सीतायाश्च यथाभवत्॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| ‘मैं तो यह भी नहीं जानता कि महात्मा श्री राम का वनवास तथा सीता और लक्ष्मण का वनगमन कब और कैसे हुआ।’॥4॥ |
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| ‘I do not even know when and how the exile of Mahatma Shri Ram and the banishment of Sita and Lakshman took place.’॥ 4॥ |
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