श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.75.35 
अप्राप्य सदृशान् दाराननपत्य: प्रमीयताम्।
अनवाप्य क्रियां धर्म्यां यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
'जिस आर्य श्री राम ने वन में जाने की आज्ञा ली हो, यदि उसे अपनी इच्छानुसार पत्नी न मिले, तो उसे अग्निहोत्र आदि धार्मिक अनुष्ठान किए बिना ही निःसंतान मर जाना चाहिए॥ 35॥
 
'The one with whose permission Arya Sri Ram went to the forest, if he does not find a wife of his choice, he should die childless without performing religious rites like Agnihotra etc.॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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