| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना » श्लोक 33 |
|
| | | | श्लोक 2.75.33  | अकर्ता चाकृतज्ञश्च त्यक्तात्मा निरपत्रप:।
लोके भवतु विद्विष्टो यस्यार्योऽनुमते गत:॥ ३३॥ | | | | | | अनुवाद | | 'जिस व्यक्ति की अनुमति से आर्य श्री राम वन में गए हैं, वह उपकार न करने वाला, कृतघ्न, सज्जनों द्वारा त्यागा हुआ, निर्लज्ज तथा संसार में सब लोगों के द्वेष का पात्र है। | | | | 'The person with whose permission Arya Shri Ram went to the forest is one who does not do any favours, is ungrateful, is forsaken by the good men, is shameless and is the object of hatred of everyone in the world. | | ✨ ai-generated | | |
|
|