श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.75.26 
संश्रुत्य च तपस्विभ्य: सत्रे वै यज्ञदक्षिणाम्।
तां चापलपतां पापं यस्यार्योऽनुमते गत:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
'जिसके कहने पर भाई राम को वन जाना पड़ा, उसे वही पाप करना चाहिए जो उन लोगों को करना चाहिए जो यज्ञ में कष्ट सह रहे पुरोहितों को दक्षिणा देने का वचन देकर फिर देने से इन्कार कर देते हैं।॥ 26॥
 
'The one on whose advice brother Rama had to go to the forest, should commit the same sins as those who promise to give dakshina to the priests suffering in the yagya and then refuse to do so.॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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