श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.75.25 
बलिषड्भागमुद‍्धृत्य नृपस्यारक्षितु: प्रजा:।
अधर्मो योऽस्य सोऽस्यास्तु यस्यार्योऽनुमते गत:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
'जिसकी आज्ञा से आर्य श्री राम वन गए, वह उसी पाप का भागी है जो उस राजा को लगता है जो अपनी प्रजा की आय का छठा भाग ले लेता है, परन्तु उसकी रक्षा नहीं करता।॥ 25॥
 
'The one with whose permission Arya Shri Ram went to the forest is a party to the same sin that a king incurs when he takes one-sixth of his subjects' income but does not protect them.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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