श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  2.75.20 
आर्ये कस्मादजानन्तं गर्हसे मामकल्मषम्।
विपुलां च मम प्रीतिं स्थितां जानासि राघवे॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'आर्य! यहाँ जो कुछ हुआ है, उसका मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं था। मैं पूर्णतः निर्दोष हूँ, फिर भी आप मुझे दोष क्यों दे रहे हैं? आप तो जानते ही हैं कि मैं श्री रघुनाथजी से कितना प्रेम करता हूँ॥ 20॥
 
'Arya! I had no idea about what has happened here. I am completely innocent, yet why are you blaming me? You know how deeply I love Shri Raghunathji.॥ 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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