| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना » श्लोक 17 |
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| | | | श्लोक 2.75.17  | इत्यादिबहुभिर्वाक्यै: क्रूरै: सम्भर्त्सितोऽनघ:।
विव्यथे भरतोऽतीव व्रणे तुद्येव सूचिना॥ १७॥ | | | | | | अनुवाद | | जब कौसल्या ने निर्दोष भरत को ऐसे अनेक कठोर वचन कहकर धिक्कारा, तब उन्हें बड़ी पीड़ा हुई, मानो किसी ने उनके घाव में सुई चुभो दी हो॥17॥ | | | | When Kausalya denounced the innocent Bharata by saying many such harsh words, he felt great pain, as if someone had pricked a needle into his wound.॥ 17॥ | | ✨ ai-generated | | |
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