श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 75: कौसल्या के सामने भरत का शपथ खाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.75.15 
कामं वा स्वयमेवाद्य तत्र मां नेतुमर्हसि।
यत्रासौ पुरुषव्याघ्रस्तप्यते मे सुतस्तप:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘अथवा आप अपनी इच्छानुसार मुझे स्वयं उस स्थान पर ले चलें जहाँ मेरे सिंहरूपी पुत्र श्री राम तपस्या कर रहे हैं।॥15॥
 
‘Or, according to your wish, you yourself can take me to the place where my son, the lion-like man, Shri Ram, is performing tapasya.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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