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श्लोक 2.74.36  |
संरक्तनेत्र: शिथिलाम्बरस्तथा
विधूतसर्वाभरण: परंतप:।
बभूव भूमौ पतितो नृपात्मज:
शचीपते: केतुरिवोत्सवक्षये॥ ३६॥ |
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| अनुवाद |
| उत्सव समाप्त होने पर शत्रुओं को संताप देते हुए राजकुमार भरत शचीपति इन्द्र के ध्वज के समान भूमि पर गिर पड़े। क्रोध से उनकी आँखें लाल हो गई थीं, वस्त्र ढीले हो गए थे और आभूषण टूटकर बिखर गए थे॥36॥ |
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| After the festival was over, Prince Bharata, who was tormenting his enemies, was lying on the ground like the flag of Sachipati Indra that had been thrown down. His eyes were red with anger, his clothes were loose and all his ornaments were broken and scattered. ॥ 36॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतु:सप्ततितम: सर्ग:॥ ७४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७४॥ |
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