श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 74: भरत का कैकेयी को कड़ी फटकार देना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.74.32 
नह्यहं पापसंकल्पे पापे पापं त्वया कृतम्।
शक्तो धारयितुं पौरैरश्रुकण्ठैर्निरीक्षित:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे पापी! नगर के लोग आँसुओं से रुँधे हुए गले से मेरी ओर देखते हैं और तुम्हारे द्वारा किए गए इस पाप का भार मुझे उठाना पड़े - यह मेरे लिए संभव नहीं है॥32॥
 
'O sinner who has sinful intentions! The people of the city look at me with their throats choked with tears and I have to bear the burden of this sin committed by you - this is not possible for me.॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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