श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 74: भरत का कैकेयी को कड़ी फटकार देना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.74.30 
अहं त्वपचितिं भ्रातु: पितुश्च सकलामिमाम्।
वर्धनं यशसश्चापि करिष्यामि न संशय:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
'इस राज्य को लौटकर मैं अपने भाई का पूजन करूँगा और अन्त्येष्टि आदि सब कर्म करके अपने पिता का भी पूर्णतया पूजन करूँगा तथा निःसंदेह केवल वही कर्म करूँगा जिनसे आपके द्वारा दिया हुआ कलंक दूर हो और मेरी कीर्ति बढ़े॥30॥
 
'After returning this kingdom I will worship my brother and after performing all the last rites etc. I will also worship my father fully and without any doubt I will do only those deeds which will remove the stigma given by you and enhance my fame.॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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