श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 74: भरत का कैकेयी को कड़ी फटकार देना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.74.25 
यस्या: पुत्रसहस्रैस्तु कृत्स्नं व्याप्तमिदं जगत्।
तां दृष्ट्वा रुदतीं शक्रो न सुतान् मन्यते परम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
'जिस कामधेनु के हजारों पुत्र इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को परिपूर्ण करते हैं, उसे इस प्रकार रोते हुए देखकर इन्द्र ने मान लिया कि पुत्र से बढ़कर कोई वस्तु नहीं है॥ 25॥
 
'On seeing Kamadhenu, whose thousands of sons fill this entire universe, weeping like this, Indra accepted that nothing is greater than a son.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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