श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 74: भरत का कैकेयी को कड़ी फटकार देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.74.17 
अधस्ताद् व्रजतस्तस्या: सुरराज्ञो महात्मन:।
बिन्दव: पतिता गात्रे सूक्ष्मा: सुरभिगन्धिन:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उस समय महापुरुष देवराज इन्द्र सुरभि नदी से होकर जा रहे थे। कामधेनु के सुगन्धित आँसू की दो बूँदें उनके शरीर पर गिरीं॥17॥
 
‘At that time, the great soul Devraj Indra was passing through the Surbhi river. Two drops of fragrant tears of Kamadhenu fell on his body.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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