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श्लोक 2.74.10-11  |
यत् त्वया धार्मिको रामो नित्यं सत्यपरायण:।
वनं प्रस्थापितो वीर: पितापि त्रिदिवं गत:॥ १०॥
यत् प्रधानासि तत् पापं मयि पित्रा विना कृते।
भ्रातृभ्यां च परित्यक्ते सर्वलोकस्य चाप्रिये॥ ११॥ |
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| अनुवाद |
| 'आपने सदा सत्य परायण रहने वाले धर्मात्मा एवं वीर श्री राम को वन में भेज दिया और आपके ही कारण मेरे पिता की मृत्यु हुई। आपके इन दुष्कर्मों से जो पाप हुआ है, उसका फल अब मुझमें दिख रहा है। अतः मैं पितृहीन हो गया हूँ, अपने दोनों भाइयों से अलग हो गया हूँ और समस्त संसार के लोगों में अप्रसन्न हो गया हूँ।॥ 10-11॥ |
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| 'You sent the virtuous and brave Shri Ram, who was always devoted to truth, to the forest and because of you my father died. The sin which you have committed by these misdeeds is now showing its effect in me. Hence I have become fatherless, have been separated from my two brothers and have become unpopular to the people of the entire world.॥ 10-11॥ |
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