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ramayan 2.73.6: ‘आपको पाकर वचनों के पक्के और यशस्वी मेरे पिता महाराज दशरथ इन दिनों अपार दुःख सहकर प्राण त्यागने को विवश हो रहे हैं।॥6॥   |   ramayan सर्ग 2.73: भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 73: भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.73.6 
त्वां प्राप्य हि पिता मेऽद्य सत्यसंधो महायशा:।
तीव्रदु:खाभिसंतप्तो वृत्तो दशरथो नृप:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
‘आपको पाकर वचनों के पक्के और यशस्वी मेरे पिता महाराज दशरथ इन दिनों अपार दुःख सहकर प्राण त्यागने को विवश हो रहे हैं।॥6॥
 
‘After getting you, my father Maharaja Dasaratha, who is faithful to his promises and who is illustrious, is forced to give up his life these days due to the immense pain he suffers.॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)