श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 73: भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.73.5 
मृत्युमापादितो राजा त्वया मे पापदर्शिनि।
सुखं परिहृतं मोहात् कुलेऽस्मिन् कुलपांसनि॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'हे पाप पर ही दृष्टि रखने वाले! तुम कुल के कलंक हो! तुमने मेरे राजा को मृत्यु के मुख में डाल दिया है और मोहवश इस कुल का सुख सदा के लिए छीन लिया है।॥5॥
 
'You who only set your sights on sins! You are the disgrace of the family! You have thrown my king into the jaws of death and, out of attachment, you have snatched away the happiness of this family forever. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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