श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 73: भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.73.4 
कुलस्य त्वमभावाय कालरात्रिरिवागता।
अङ्गारमुपगूह्य स्म पिता मे नावबुद्धवान्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'तुम इस कुल का नाश करने के लिए कालरात्रि के रूप में आई हो। जब मेरे पिता ने तुम्हें अपनी पत्नी बनाया था, तब उन्होंने जलते हुए अंगारों का आलिंगन किया था; किन्तु उस समय उन्हें यह बात समझ में नहीं आई।
 
‘You came as Kaalratri to destroy this clan. When my father made you his wife, he embraced the burning embers; but he did not understand this at that time.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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