श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 73: भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.73.25 
न तु कामं करिष्यामि तवाहं पापनिश्चये।
यया व्यसनमारब्धं जीवितान्तकरं मम॥ २५॥
 
 
अनुवाद
'अरे! तुम्हारा विचार बड़ा पापपूर्ण है। मैं तुम्हारी इच्छा कभी पूरी नहीं करूँगा। तुमने मेरे लिए ऐसी विपत्ति का आधार रखा है, जो मेरे प्राण भी ले सकती है।॥ 25॥
 
'Hey! Your thought is very sinful. I will never fulfill your wish. You have laid the foundation of such a calamity for me, which can even take my life.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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