श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 73: भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.73.19 
उत्पन्ना तु कथं बुद्धिस्तवेयं पापदर्शिनी।
साधुचारित्रविभ्रष्टे पूर्वेषां नो विगर्हिता॥ १९॥
 
 
अनुवाद
हे सदाचार से पतित पापी! जो बुद्धि केवल पापों में ही लगी रहती है, जिसकी मेरे पूर्वज सदैव निन्दा करते थे, वह तुझमें कैसे आई?॥19॥
 
'O sinner who has fallen from good character! How did that intellect which focuses only on sins, which my ancestors always criticized, come into you?॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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