श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 73: भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.73.17 
अथवा मे भवेच्छक्तिर्योगैर्बुद्धिबलेन वा।
सकामां न करिष्यामि त्वामहं पुत्रगर्द्धिनीम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
'यदि मुझमें अनेक प्रकार से राज्य पालन करने की शक्ति हो और मैं अपनी बुद्धि से राज्य का पालन कर सकूँ, तो भी मैं तुम्हारी, कैकेयी की, केवल अपने पुत्र के लिए राज्य चाहने की इच्छा को पूर्ण नहीं होने दूँगा।
 
‘Or even if I have the power to support the kingdom by various means and by my intelligence, I will not let the desire of you, Kaikeyi, of wanting the kingdom only for your son, be fulfilled.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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