श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 73: भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.73.13 
लुब्धाया विदितो मन्ये न तेऽहं राघवं यथा।
तथा ह्यनर्थो राज्यार्थं त्वयाऽऽनीतो महानयम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
'तुम लोभी हो। मैं समझता हूँ कि इसीलिए तुम श्री रामचन्द्रजी के प्रति मेरे भावों को नहीं जानते, इसीलिए तुमने राज्य के लिए यह महान दुष्कर्म किया है॥13॥
 
'You are greedy. I think that is why you do not know what my feelings are for Shri Ramchandraji, that is why you have committed this great misdeed for the sake of the kingdom.॥ 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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