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सर्ग 73: भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना
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श्लोक 11
श्लोक
2.73.11
तस्या: पुत्रं महात्मानं चीरवल्कलवाससम्।
प्रस्थाप्य वनवासाय कथं पापे न शोचसे॥ ११॥
अनुवाद
'पापी! तूने उसके महान पुत्र को चीथड़े और छाल पहनाकर वन में रहने के लिए भेज दिया। फिर भी तू शोक क्यों नहीं कर रहा?'
‘Sinner! You dressed his great son in a rag and bark and sent him to live in the forest. Still why are you not grieving?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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