श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 73: भरत का कैकेयी को धिक्कारना और उसके प्रति महान् रोष प्रकट करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.73.10 
तथा ज्येष्ठा हि मे माता कौसल्या दीर्घदर्शिनी।
त्वयि धर्मं समास्थाय भगिन्यामिव वर्तते॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मेरी बड़ी माता कौशल्या भी बड़ी दूरदर्शी हैं। धर्म का आश्रय लेकर वे तुम्हें बहन के समान मानती हैं॥10॥
 
‘My elder mother Kausalya is also very farsighted. Taking shelter of Dharma, she treats you like a sister.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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