श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 71: रथ और सेना सहित भरत की यात्रा, अयोध्या की दुरवस्था देखते हुए सारथि से अपना दुःखपूर्ण उद्गार प्रकट करते हुए राजभवन में प्रवेश  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.71.35 
किमहं त्वरयाऽऽनीत: कारणेन विनानघ।
अशुभाशङ्कि हृदयं शीलं च पततीव मे॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
'अरे भोले बेटे! मुझे बिना कारण इतनी जल्दी क्यों बुलाया गया? यह सोचकर मेरे मन में अनिष्ट की आशंका हो रही है। मेरी इस स्थिति से मेरा विनम्र स्वभाव भी भ्रष्ट हो रहा है।॥35॥
 
‘Innocent son! Why was I called so hastily without any reason? Thinking about this, I fear something bad in my heart. My humble nature is also being corrupted by my condition. ॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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