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ramayan 2.71.34: भरत का मन एकाग्र नहीं था; वे घबरा रहे थे। अतः रघुकुलपुत्र भरत ने अपने साथ आए द्वारपालों को आदरपूर्वक वापस भेज दिया और केकयराज अश्वपति के थके हुए सारथि से यह कहा -॥34॥   |   ramayan सर्ग 2.71: रथ और सेना सहित भरत की यात्रा, अयोध्या की दुरवस्था देखते हुए सारथि से अपना दुःखपूर्ण उद्गार प्रकट करते हुए राजभवन में प्रवेश   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 71: रथ और सेना सहित भरत की यात्रा, अयोध्या की दुरवस्था देखते हुए सारथि से अपना दुःखपूर्ण उद्गार प्रकट करते हुए राजभवन में प्रवेश  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.71.34 
स त्वनेकाग्रहृदयो द्वा:स्थं प्रत्यर्च्य तं जनम्।
सूतमश्वपते: क्लान्तमब्रवीत् तत्र राघव:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
भरत का मन एकाग्र नहीं था; वे घबरा रहे थे। अतः रघुकुलपुत्र भरत ने अपने साथ आए द्वारपालों को आदरपूर्वक वापस भेज दिया और केकयराज अश्वपति के थके हुए सारथि से यह कहा -॥34॥
 
Bharata's heart was not focused; he was nervous. So, Bharata, the son of the Raghukul, respectfully sent back the gatekeepers who had accompanied him and said this to the tired charioteer of Kekayaraj Ashwapati -॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)