श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 71: रथ और सेना सहित भरत की यात्रा, अयोध्या की दुरवस्था देखते हुए सारथि से अपना दुःखपूर्ण उद्गार प्रकट करते हुए राजभवन में प्रवेश  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.71.33 
द्वारेण वैजयन्तेन प्राविशच्छ्रान्तवाहन:।
द्वा:स्थैरुत्थाय विजयमुक्तस्तै: सहितो ययौ॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
चूँकि पुरी के द्वार पर हमेशा वैजयंती ध्वज फहराया जाता था, इसलिए उस द्वार का नाम वैजयंत रखा गया। (यह पुरी के पश्चिमी भाग में था।) भरत ने उस वैजयंत द्वार से नगर में प्रवेश किया। उस समय उनके रथ के घोड़े बहुत थके हुए थे। द्वारपालों ने खड़े होकर कहा - 'राजा की जय हो!' फिर वे उनके साथ आगे बढ़े।
 
Because the Vaijayanti flag was always hoisted at the gate of Puri, that gate was named Vaijayanta. (It was in the western part of Puri.) Bharata entered the city from that Vaijayanta gate. At that time the horses of his chariot were very tired. The gatekeepers stood up and said – ‘Victory to the king!’ Then they proceeded with him.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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