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श्लोक 2.71.30  |
अनिष्टानि च पापानि पश्यामि विविधानि च।
निमित्तान्यमनोज्ञानि तेन सीदति मे मन:॥ ३०॥ |
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| अनुवाद |
| 'मैं अनेक प्रकार के अशुभ, क्रूर और अशुभ शकुन देख रहा हूँ, जिनसे मेरा मन दुःखी हो रहा है।॥30॥ |
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| 'I am seeing many kinds of evil, cruel and ominous omens, which are making my mind sad.॥ 30॥ |
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