श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 71: रथ और सेना सहित भरत की यात्रा, अयोध्या की दुरवस्था देखते हुए सारथि से अपना दुःखपूर्ण उद्गार प्रकट करते हुए राजभवन में प्रवेश  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.71.27 
नाद्यापि श्रूयते शब्दो मत्तानां मृगपक्षिणाम्।
सरक्तां मधुरां वाणीं कलं व्याहरतां बहु॥ २७॥
 
 
अनुवाद
‘मदमस्त मृगों और मधुर स्वर में गाने वाले पक्षियों का कोलाहलपूर्ण शब्द अभी तक नहीं सुना गया है।॥27॥
 
‘The tumultuous sounds of the intoxicated deer and birds singing sweetly in melody have not yet been heard.॥ 27॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas