श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 70: दूतों का भरत को वसिष्ठजी का संदेश सुनाना, भरत का पिता आदि की कुशल पूछना, शत्रुघ्न के साथ अयोध्या की ओर प्रस्थान करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.70.10 
आत्मकामा सदा चण्डी क्रोधना प्राज्ञमानिनी।
अरोगा चापि मे माता कैकेयी किमुवाच ह॥ १०॥
 
 
अनुवाद
'मेरी माता कैकेयी, जो सदैव अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहती हैं और अपने को बड़ी बुद्धिमान समझती हैं, उस उग्र स्वभाव से उन्हें कोई कष्ट नहीं होता? उन्होंने क्या कहा है?'॥10॥
 
'My mother Kaikeyi, who always wants to fulfill her own selfish interests and considers herself very intelligent, has no trouble with that fierce temperament? What has she said?'॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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