श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 7: मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  2.7.33-34 
दत्त्वा त्वाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रमदोत्तमा।
कैकेयी मन्थरां हृष्टा पुनरेवाब्रवीदिदम्॥ ३३॥
इदं तु मन्थरे मह्यमाख्यातं परमं प्रियम्।
एतन्मे प्रियमाख्यातं किं वा भूय: करोमि ते॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
वह आभूषण कुब्जा को देकर परम सुन्दरी कैकेयी ने हर्ष में भरकर पुनः मन्थरा से इस प्रकार कहा - 'मंथरा! तुमने मुझे बड़ा ही सुखद समाचार सुनाया है। यह सुखद समाचार सुनाकर मैं तुम्हारा और क्या उपकार कर सकती हूँ?'
 
After giving that ornament to Kubja, the most beautiful woman Kaikeyi, filled with joy, again said to Manthara in this manner - 'Manthara! You have told me very pleasant news. What more favour can I do for you for telling me this pleasant news?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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