श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 7: मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.7.32 
अतीव सा तु संतुष्टा कैकेयी विस्मयान्विता।
दिव्यमाभरणं तस्यै कुब्जायै प्रददौ शुभम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
कैकेयी मन ही मन बहुत संतुष्ट हुईं और आश्चर्य से मुस्कराते हुए कुब्जा को एक बहुत ही सुंदर दिव्य आभूषण पुरस्कार स्वरूप दिया।
 
Kaikeyi was very satisfied in her heart. Smiling with wonder, she gave Kubja a very beautiful divine ornament as a reward.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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