श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 7: मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.7.31 
मन्थराया वच: श्रुत्वा शयनात् सा शुभानना।
उत्तस्थौ हर्षसम्पूर्णा चन्द्रलेखेव शारदी॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
मन्थरा के ये वचन सुनकर सुन्दर मुखवाली कैकेयी सहसा बिस्तर से उठ बैठीं। उनका हृदय हर्ष से भर गया। वे शरद पूर्णिमा की चांदनी के समान चमक उठीं। 31॥
 
Hearing these words of Manthara, beautiful faced Kaikeyi suddenly got up from the bed. His heart was filled with joy. She became bright like the moonlight of autumn full moon. 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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