श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 7: मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.7.30 
सा प्राप्तकालं कैकेयि क्षिप्रं कुरु हितं तव।
त्रायस्व पुत्रमात्मानं मां च विस्मयदर्शने॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
"राजकुमारी केकय! ऐसा दुःखद समाचार सुनकर भी तुम मेरी ओर ऐसे देख रही हो मानो प्रसन्न हो रही हो और मेरे वचनों से तुम्हें आश्चर्य हो रहा है। परन्तु इस आश्चर्य को त्यागकर शीघ्र ही अपना वह कल्याणकारी कार्य करो जिसका समय आ गया है और ऐसा करके अपना, अपने पुत्र का तथा मेरा भी उद्धार करो।" ॥30॥
 
"Princess Kekaya! Even after hearing such sad news you are looking at me as if you are happy and you are surprised by my words. But leave this surprise and quickly do your beneficial work for which the time has come and by doing so save yourself, your son and me as well." ॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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