श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 7: मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.7.27 
शत्रु: पतिप्रवादेन मात्रेव हितकाम्यया।
आशीविष इवाङ्गेन बाले परिधृतस्त्वया॥ २७॥
 
 
अनुवाद
‘पुत्र! जैसे माता अपने पुत्र का कल्याण चाहने से उसका पालन-पोषण करती है, वैसे ही जिस पुरुष का तुमने पालन-पोषण किया, जो तुम्हारा पति कहलाता है, वही वास्तव में तुम्हारा शत्रु निकला। जैसे कोई अज्ञानवश सर्प को गोद में लेकर उसका पालन-पोषण करता है, वैसे ही तुमने उस सर्प के समान आचरण करने वाले महाराज को अपनी गोद में स्थान दिया है॥ 27॥
 
‘Child! Just as a mother nourishes her son with the desire for his welfare, the person whom you nourished, who is called your husband, has actually turned out to be your enemy. Just as someone, out of ignorance, takes a snake in his lap and nourishes it, in the same way you have given place in your lap to that Maharaja who behaved like a snake.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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