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ramayan 2.7.26: 'उसका हृदय इतना भ्रष्ट हो गया है कि उसने भरत को तुम्हारे ननिहाल भेज दिया है और कल प्रातःकाल वह श्री राम को अयोध्या का निष्कंटक राजा अभिषिक्त करेगा।॥ 26॥   |   ramayan सर्ग 2.7: मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 7: मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  2.7.26 
अपवाह्य तु दुष्टात्मा भरतं तव बन्धुषु।
काल्ये स्थापयिता रामं राज्ये निहतकण्टके॥ २६॥
 
 
अनुवाद
'उसका हृदय इतना भ्रष्ट हो गया है कि उसने भरत को तुम्हारे ननिहाल भेज दिया है और कल प्रातःकाल वह श्री राम को अयोध्या का निष्कंटक राजा अभिषिक्त करेगा।॥ 26॥
 
'His heart is so corrupt that he has sent Bharata to your maternal home and tomorrow morning he will anoint Sri Rama as the untroubled king of Ayodhya.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)