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श्लोक 2.7.26  |
अपवाह्य तु दुष्टात्मा भरतं तव बन्धुषु।
काल्ये स्थापयिता रामं राज्ये निहतकण्टके॥ २६॥ |
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| अनुवाद |
| 'उसका हृदय इतना भ्रष्ट हो गया है कि उसने भरत को तुम्हारे ननिहाल भेज दिया है और कल प्रातःकाल वह श्री राम को अयोध्या का निष्कंटक राजा अभिषिक्त करेगा।॥ 26॥ |
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| 'His heart is so corrupt that he has sent Bharata to your maternal home and tomorrow morning he will anoint Sri Rama as the untroubled king of Ayodhya.॥ 26॥ |
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