श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 7: मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.7.25 
उपस्थित: प्रयुञ्जानस्त्वयि सान्त्वमनर्थकम्।
अर्थेनैवाद्य ते भर्ता कौसल्यां योजयिष्यति॥ २५॥
 
 
अनुवाद
"तुम्हारे पति तुम्हें व्यर्थ ही सांत्वना देने के लिए यहाँ आते हैं, परन्तु अब वे स्वयं रानी कौशल्या को धन-संपत्ति से आशीर्वाद देने जा रहे हैं ॥ 25॥
 
"Your husband comes here to console you in vain, but he himself is now going to bless Queen Kausalya with wealth. ॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)