श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 7: मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.7.17 
कैकेयी त्वब्रवीत् कुब्जां कच्चित् क्षेमं न मन्थरे।
विषण्णवदनां हि त्वां लक्षये भृशदु:खिताम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उस समय राजकुमारी केकय ने कुब्जा से पूछा - 'मंथरा ! क्या कोई अनहोनी घटित हुई है ? क्योंकि तुम्हारा मुखमंडल विषाद से भरा हुआ है और तुम मुझे अत्यन्त दुःखी दिखाई दे रही हो ॥ 17॥
 
At that time princess Kekaya asked Kubja - 'Manthra! Has anything untoward happened? Because your face is filled with gloom and you appear very sad to me.'॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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