| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 2: अयोध्या काण्ड » सर्ग 7: मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना » श्लोक 15 |
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| | | | श्लोक 2.7.15  | अनिष्टे सुभगाकारे सौभाग्येन विकत्थसे।
चलं हि तव सौभाग्यं नद्या: स्रोत इवोष्णगे॥ १५॥ | | | | | | अनुवाद | | तेरे प्रियतम तेरे सम्मुख इस प्रकार उपस्थित होते हैं, मानो अपना सारा सौभाग्य तुझे अर्पण कर रहे हों; किन्तु पीठ पीछे वे तुझे हानि पहुँचाते हैं। तू अपने सौभाग्य का बखान यह सोचकर करता है कि वह तुझ पर मोहित है; किन्तु जैसे ग्रीष्म ऋतु में नदी का प्रवाह सूख जाता है, वैसे ही तेरा सौभाग्य भी अब अस्थिर हो गया है - वह तेरे हाथ से निकल जाना चाहता है!॥15॥ | | | | ‘Your beloveds appear before you in such a manner as if they are offering you all their good fortune, but behind your back they harm you. You boast of your good fortune, thinking that he is infatuated with you, but just like the flow of a river dries up in the summer season, similarly your good fortune has now become unstable – it wants to slip away from your hands!’॥ 15॥ | | ✨ ai-generated | | |
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