श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 7: मन्थरा का कैकेयी को उभाड़ना, कैकेयी का उसे पुरस्कार में आभूषण देना और वर माँगने के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.7.14 
उत्तिष्ठ मूढे किं शेषे भयं त्वामभिवर्तते।
उपप्लुतमघौघेन नात्मानमवबुध्यसे॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे मूर्ख! उठ! क्या तू सो रहा है? तेरे ऊपर बड़ा भय छा गया है। हे! तेरे ऊपर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा है, फिर भी तू अपनी इस दुर्दशा से अनभिज्ञ है?॥14॥
 
‘Fool! Get up. Are you sleeping? A great fear has come over you. Oh! A mountain of troubles has fallen on you, yet you are not aware of your miserable condition?’॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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